महाद्वीपीय विस्थापन सिद्धान्त की परिकल्पना :Continental Drift Theory

महाद्वीपीय विस्थापन सिद्धान्त की परिकल्पना :Continental Drift Theory

महाद्वीपीय विस्थापन सिद्धान्त की परिकल्पना :Continental Drift Theory

पृथ्वी :उत्तरी गोलार्द्ध और दक्षिणी गोलार्द्ध

  • पृथ्वी के दो महत्वपूर्ण भाग हैं–महासागर और महाद्वीप। पृथ्वी के 70.8% भाग पर महासागरों तथा 29.2% भाग पर महाद्वीपों का विस्तार है।
  • उत्तरी गोलार्द्ध पर दक्षिणी गोलार्द्ध की अपेक्षा अधिक स्थलीय भाग है।
    • उत्तरी गोलार्द्ध का लगभग 60% भाग स्थलीय है।
    • अतः उत्तरी गोलार्द्ध को स्थल गोलार्द्ध भी कहते हैं।
  • दक्षिणी गोलार्द्ध पर जल की प्रधानता है।
    • इस गोलार्द्ध पर लगभग 81% जल पाया जाता है।
    • अतः इसे जलीय गोलार्द्ध भी कहते हैं।
  • ऐसा माना जाता है कि महाद्वीप एक दूसरे से दूर खिसक रहे हैं।
  • इस सम्बन्ध में समय समय पर भिन्न भिन्न सिद्धांतों का प्रतिपादन किया गया जिनमें कुछ प्रमुख निम्नलिखित हैं :

महाद्वीपीय विस्थापन परिकल्पना

  • महाद्वीपीय विस्थापन परिकल्पना परिकल्पना के प्रतिपादक एफ. बी. टेलर थे।
  • इस परिकल्पना का मुख्य उद्देश्य “तृतीयक युग के मोड़दार पर्वतों की व्याख्या करना था।”
  • इस परिकल्पना के अनुसार क्रिटेशियस शक में मुख्यतः दो स्थल भाग थे :
    • लॉरेशिया-उत्तरी ध्रुव के पास तथा
    • गोंडवानालैंड दक्षिणी ध्रुव के पास।
  • टेलर इन महाभूखण्डों का प्रवाह विषुवत रेखा और पश्चिम की तरफ बताया और इनके प्रवाह का मुख्य कारण ज्वारीय बल माना।
    • इनके अनुसार लॉरेशिया महाद्वीप के प्रवाह से खिंचाव व विभंजन के फलस्वरूप बैफिन की खाड़ी, डेविस जलडमरूमध्य, लैब्रोडोर सागर और आर्कटिक सागर की रचना हुई।
    • इसी प्रकार गोंडवानालैंड के प्रवाह से  ग्रेट आस्ट्रेलिया वाइट तथा रास सागर का निर्माण हुआ।
    • इन महाद्वीपों के प्रवाह के समय जहाँ भी अवरोध था वहाँ पर्वतों व द्वीपीय चाप का निर्माण हुआ।

वेगनर का महाद्वीपीय प्रवाह सिद्धान्त (Continental Drift Theory of Wegener)

  •  प्रसिद्ध जर्मन विद्वान वेगनर ने 1912 ई. में यह सिद्धान्त प्रस्तुत किया।
    • उन्होंने बताया कि वर्तमान महाद्वीपों को मिलाकर एक भौगोलिक एकरूपता दी जा सकती है।
    • उनके अनुसार कार्बोनीफेरस शक में पृथ्वी के सभी स्थल खण्ड आपस में जुड़े हुए थे।
    • इस वृहद स्थलखण्ड को उन्होंने पैंजिया कहा।
    • पैंजिया के चारों ओर एक वृहद महासागर का विस्तार था जिसे उन्होंने पैंथालासा नाम दिया।
    • ट्रियासिक शक के अंतिम चरण में पैंजिया का विभाजन प्रारम्भ हुआ एवं इसका एक भाग उत्तर की ओर तथा दूसरा भाग दक्षिण की ओर प्रवाहित हुआ।
      • उत्तरी भाग लॉरेशिया (अंगारलैंड) तथा दक्षिणी भाग गोंडवानालैंड कहलाया।
      • इन दोनों भागों के बीच एक उथला व संकीर्ण महासागर खुला जिसे ‘टेथिस सागर’ कहा गया।
      • लगभग 6.5 करोड़ वर्ष पूर्व गोंडवानालैंड के विभंजन के फलस्वरूप दक्षिणी अमेरिका, अफ्रीका, प्रायद्वीपीय भारत, मेडागास्कर व आस्ट्रेलिया का निर्माण हुआ।
      • प्रायद्वीपीय भारत के उत्तर की ओर प्रवाहित होने के कारण हिन्द महासागर खुला।
      • उधर अंगारलैंड के विभाजन से उत्तरी अमेरिका, यूरोप तथा एशिया बना।
      • उत्तरी तथा दक्षिणी अमेरिका के पश्चिम की ओर विस्थापन से अटलांटिक महासागर निर्मित हुआ एवं रॉकी व एंडीज पर्वतों का निर्माण हुआ।
      • इसी प्रकार अफ्रीका तथा प्रायद्वीपीय भारत के उत्तर की ओर विस्थापन से हिमालय तथा अल्पाइन पर्वतों का निर्माण हुआ।
      • अंटार्कटिका तथा प्रशांत महासागर क्रमशः पैंजिया तथा पैंथालासा के अवशिष्ट भाग हैं।
    • पैंजिया वृहद स्थल खण्ड के टूटने कारण गुरुत्व बल, प्लवनशीलता व ज्वारीय बल माना जाता है।
महाद्वीपीय विस्थापन सिद्धान्त की परिकल्पना :Continental Drift Theory : सिद्धान्त के पक्ष में अनेक प्रमाण
  • भौगोलिक साम्य रूपता |
  • ग्लोसोप्टिरस वनस्पतियों के अवशेषों का  भारत, मेडागास्कर, दक्षिणी अफ्रीका, आस्ट्रेलिया व अंटार्कटिका के अलग-अलग जलवायु प्रदेशों में पाया जाना।
  • छोटा नागपुर के पठार में हिमोढ़ो का मिलना |
  • डायनासोर तथा लेमिंग मछली के जीवाश्मों का कनाडा में पाया जाना आदि प्रमाण वेगनर के सिद्धान्त की मौलिकता प्रमाणित करते हैं।
    • किन्तु इस सिद्धान्त द्वारा विवेचित बल महाद्वीपीय विस्थापन के लिए अपर्याप्त हैं।

प्लेट विवर्तनिकी सिद्धान्त (Plate Tectonic Theory)

  • इस सिद्धान्त को वेगनर के महाद्वीपीय विस्थापन सिद्धान्त का विकास माना जाता है।
  • स्थलीय दृढ़ भू-खण्ड को प्लेट कहते हैं।
  • पृथ्वी का निर्माण विभिन्न प्लेटों से हुआ है।
  • ये प्लेटें अपने ऊपर स्थित महाद्वीप तथा महासागरीय भागों को अपने प्रवाह के साथ स्थानान्तरित करती हैं।
  • पुराचुम्बकत्व एवं सागर नितल प्रसरण के प्रमाणों से स्पष्ट हो गया है कि महासागरीय नितल में प्रसार हो रहा है।
  • इस सिद्धान्त का प्रतिपादन हैरी हेस ने किया था। किन्तु इसकी वैज्ञानिक व्याख्या W. J. मोर्गन ने की।
  • यह सिद्धान्त महाद्वीपीय प्रवाह, समुद्र तली प्रसारण, ध्रुवीय परिभ्रमण, द्वीप चाप व महासागरीय कटक आदि पर प्रकाश डालता है।
  • इस सिद्धान्त के अनुसार पृथ्वी की भू-पर्पटी अनेक छोटी व बड़ी प्लेटों में विभक्त है।
  • ये प्लेटें 100km की मोटाई वाले स्थल मण्डल से निर्मित होती हैं एवं दुर्बल मण्डल (एस्थेनोस्फेयर) पर तैरती हैं। जो पूर्णतया SiMa का बना होता है व अपेक्षाकृत अधिक घनत्व का होता है।
  • प्लेटीय संचलन का मुख्य कारण “तापीय संवहन तरगों की चक्रीय प्रक्रिया” का होना है।
  • प्लेटों की संख्या 100 तक बताई गई है।
    • किन्तु अभी तक केवल 7 बड़ी व 20 छोटी प्लेटों को ही पहचाना जा सका है।
    • बड़ी प्लेटें इस प्रकार हैं :
      • अंटार्कटिक प्लेट,
      • उत्तरी अमेरिकी प्लेट,
      • दक्षिणी अमेरिकी प्लेट,
      • प्रशान्त महासागरीय प्लेट,
      • इंडो-ऑस्ट्रेलियन प्लेट,
      • अफ्रीकी प्लेट,
      • यूरेशियाई प्लेट।
    • छोटी प्लेट :
      • कोकास प्लेट,
      • नजका प्लेट,
      • अरेबियन प्लेट,
      • फिलीपीन प्लेट,
      • कैरोलिन प्लेट,
      • फ्यूजी प्लेट,
      • स्कोशिया प्लेट,
      • कैरेबियन प्लेट,
      • तिब्बत प्लेट,
      • सोमाली प्लेट,
      • नुबियन प्लेट,
      • जुआन-डी-फूका प्लेट,
      • बर्मी प्लेट आदि प्रमुख हैं।
  • प्लेटें पूर्णतः महासागरीय, पूर्णतः महाद्वीपीय अथवा मिश्रित हो सकती हैं। जो इस बात निर्भर करता है कि प्लेट का अधिकांश भाग किससे सम्बद्ध है।
    • जैसे प्रशान्त प्लेट पूर्णतया महासागरीय है एवं यूरेशियाई व अंटार्कटिका प्लेट पूर्णतया महाद्वीपीय है।
    • जबकि अमेरिकी व भारतीय प्लेट मिश्रित प्रकार का है।
महाद्वीपीय विस्थापन सिद्धान्त की परिकल्पना :Continental Drift Theory
महाद्वीपीय विस्थापन सिद्धान्त की परिकल्पना :Continental Drift Theory
प्लेटों के किनारे ही, भू-गर्भिक क्रियाओं के दृष्टिकोण से सर्वाधिक महत्वपूर्ण होते हैं क्योंकि इन्हीं किनारों के सहारे भूकम्पीय, ज्वालामुखीय तथा विवर्तनिक घटनाएं घटित होती हैं। सामान्तया प्लेटों के किनारे तीन प्रकार के होते हैं।
रचनात्मक किनारा (Constructive Margin)
  • तापीय संवहन तरगों के उपरिमुखी स्तम्भों के ऊपर अवस्थित दो समान अथवा असमान घनत्व तथा मोटाई वाली प्लेटें एक दूसरे के विपरीत दिशा में गतिशील होती हैं।
    • तो दोनों के मध्य भू-पर्पटी में दरार बन जाती है जिसके सहारे एस्थेनोस्फेयर का मैग्मा ऊपर आता है और ठोस होकर नवीन भू-पर्पटी का निर्माण करता है।
    • अतः इन प्लेट किनारों को रचनात्मक किनारा कहते हैं तथा इस तरह की प्लेटें “अपसारी प्लेटें” कहलाती हैं।
    • इसका सर्वोत्तम उदाहरण मध्य अटलांटिक कटक है।
विनाशात्मक किनारा (Destructive Margin)
  • तापीय संवहन तरगों के अधोमुखी स्तम्भों के ऊपर अवस्थित दो प्लेटें आमने सामने संचालित होकर टकराती हैं।
    • तो अधिक घनत्व वाली प्लेट कम घनत्व वाली प्लेट के नीचे धँस जाती हैं। इस क्षेत्र को “बेनी ऑफ मेखला या बेनी ऑफ जॉन” कहते हैं।
    • चूँकि यहाँ प्लेट का विनाश होता है। अतः इसे विनाशात्मक किनारा कहते हैं।
    • इन प्लेटों को “अभिसारी प्लेट” कहा जाता है।
अभिसारी प्लेट की अंतःक्रिया तीन प्रकार से हो सकती है :
  • जब एक अभिसारी प्लेट महाद्वीपीय तथा दूसरी महासागरीय हों तो महासागरीय प्लेट अधिक भारी होने के कारण महाद्वीपीय प्लेट के नीचे अधिगमित हो जाती है जिससे एक गर्त का निर्माण होता है एवं उसमें अवसादों के निरन्तर जमाव व वलन से मोड़दार पर्वतों का निर्माण होता है।
    • रॉकी व एंडीज पर्वत इसके मुख्य उदाहरण हैं।
    • बेनी ऑफ जॉन या अधोगमित क्षेत्र का पिघला हुआ मैग्मा भू-पर्पटी को तोड़ते हुए ज्वालामुखी का निर्माण करता है।
    • जैसे अमेरिकी प्लेट का पश्चिमी किनारा जहाँ पर्वतों का निर्माण हुआ है, ज्वालामुखी उद्गार देखने को मिलते हैं।
    • एंडीज के आंतरिक भागों में कोटोपेक्सी व चिंबाराजो जैसे ज्वालामुखी का पाया जाना इस अंतःक्रिया द्वारा स्पष्ट किया जा सकता है।
  • जब दोनों प्लेट महासागरीय हों तो अपेक्षाकृत भारी प्लेट हल्की प्लेट के नीचे धँस जाती है जिससे के फलस्वरूप महासागरीय गर्तों और ज्वालामुखी द्वीपों की एक श्रृंखला सी बन जाती है।
  • जब दोनों प्लेट महाद्वीपीय हों तो अधिगमित क्षेत्र इतना प्रभावी नहीं हो पाता कि ज्वालामुखी उत्पन्न हो सकें। परन्तु ये क्षेत्र भू-गर्भिक रूप से अस्थिर होते हैं।
    • अतः यहाँ बड़े मोड़दार पर्वतों का निर्माण होता है।
    • यूरेशियन प्लेट व इंडियन प्लेट के टकराने से टेथिस भूसन्नति के अवसादों के वलन व प्लेटीय किनारों के मुड़ाव से उत्पन्न ‘हिमालय पर्वत’ इसका अच्छा उदाहरण है।
संरक्षी प्लेट (Conservative Margin)
  • जब दो प्लेट एक दूसरे के समानान्तर खिसकती हैं तो उनमें कोई अन्तर्क्रिया नहीं हो पाती है।
    • अतः इन्हें संरक्षी किनारा कहते हैं।
    • इन प्लेटों के खिसकने के कारण रूपान्तरित भ्रंश का निर्माण होता है तथा प्लेट के किनारों के धरातलीय क्षेत्र में अन्तर नहीं होता है।
    • इस प्लेट सीमा को शीयर सीमा कहते हैं।
    • कैलिफोर्निया के निकट निर्मित सान एंड्रियास फॉल्ट रूपान्तरित भ्रंश का उदाहरण है।
महाद्वीपीय विस्थापन सिद्धान्त की परिकल्पना :Continental Drift Theory
प्लेट विवर्तनिकी सिद्धान्त (Plate Tectonic Theory)

प्लेटों की गति के कारण

पृथ्वी की सभी छोटी तथा बड़ी प्लेटें गतिशील हैं। इनकी गति करने के निम्नलखित कारण हैं:

  • पृथ्वी का घूर्णन (Rotation of the Earth)
    • भू-मध्य रेखीय भाग अधिक तीव्र गति से घूर्णन करता है।
      • इसलिए भू-मध्य रेखीय भागों पर केन्द्रापसारी बल अधिक लगता है।
    • यह बल ध्रुवों की ओर जाने पर धीरे धीरे कम होता जाता है।
      • इसके कारण यदि कोई प्लेट ध्रुवीय भाग पर स्थित है तो वह भू-मध्य रेखा की ओर प्रवाहित होती है।
      • जैसे भारतीय प्लेट दक्षिणी ध्रुव से भू-मध्य रेखा की ओर प्रवाहित हो रही है।
    • यदि कोई प्लेट देशान्तर के सहारे उत्तर से दक्षिण फैली है।
      • तो इसका प्रवाह पूर्व से पश्चिम होता है।
      • उपरोक्त प्रभाव की व्याख्या आयलर ने की थी।
      • अतः इसे “आयलर सिद्धान्त” कहते हैं।
  • हॉट-स्पॉट (Hot-spot)
    • प्लेट के नीचे मैंटल भाग में किसी किसी स्थान पर रेडियोधर्मी तत्वों की अधिकता होती है जिसके कारण वहाँ भू-तापीय ऊर्जा उत्पन्न हो जाती हैं। इस क्षेत्र को हॉट स्पॉट कहा जाता है।
    • इस स्थान से ऊर्जा संवहनीय तरगों द्वारा ऊपर उठती है। इन तरगों को प्लूम कहते हैं।
      • इन प्लूम को ही प्लेट के संचलन का प्रमुख कारण माना जाता है।

प्लेटों की गति

  • विश्व की सभी प्लेटों की गति असमान है।
  • महासागरीय प्लेटों की औसत गति 5 सेमी. प्रति वर्ष तथा महाद्वीपीय प्लेटों की औसत गति 2 सेमी. प्रति वर्ष है।
  • ग्रीनलैंड प्लेट 20 सेमी. प्रति वर्ष की दर से सर्वाधिक गति से प्रवाहित हो रही है।
  • भारतीय प्लेट गोंडवानालैंड से अलग होने के बाद 12 सेमी. प्रति वर्ष की गति से प्रवाहित हुई।
    • किन्तु यह क्रिटेशियस युग में तिब्बत के द्रास से टकराने के बाद 5 सेमी. प्रतिवर्ष की गति से उत्तर पूर्व दिशा में प्रवाहित होने लगी।

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