जीएम फसल Genetically Modified Crops

जीएम फसल Genetically Modified Crops चर्चा में क्यों है?

  • रोक के बावजूद कई राज्यों में किसान हर्बिसाइड-टोलरेंट (एचटी) कपास की खेती कर रहे हैं।
  • देश में हर्बिसाइड-टोलरेंट (एचटी) कपास की खेती को जेनेटिक इंजीनियरिंग मूल्यांकन समिति (जीईएसी) ने अभी तक मंजूरी नहीं दी है। 
  • एचटीबीटी कपास की खेती में कीटनाशकों का छिड़काव कम होने के कारण लागत तो कम आती ही है, साथ ही प्रति हेक्टेयर उत्पादकता भी ज्यादा है।
    • यही कारण है कि रोक के बावजूद किसान इसकी बुवाई को प्राथमिकता दे रहे हैं।
    • हर्बिसाइड-टोलरेंट (एचटी) कॉटन, बीटी कॉटन में इनोवेशन है।
    • इसमें राउंड-अप रेडी और राउंड-अप फ्लेक्स (आरआरएफ) जीन शामिल हैं।
    • इसे यूएस-आधारित बहुराष्ट्रीय बीज कंपनी मोनसेंटो द्वारा विकसित और वाणिज्यिक किया गया है।

जीएम फसल से संबंधित तथ्य क्या है ?

जीएम फसल Genetically Modified Crops
Genetically Modified Crops-जीएम फसल
  • आनुवंशिक रूप से संशोधित फसल, उन फसलों को कहा जाता है जिनके जीन को वैज्ञानिक तरीके से रूपांतरित किया जाता है।
  • जेनेटिक इजीनियरिंग के ज़रिये किसी भी पौधे के जीन को अन्य पौधों में डालकर एक नई फसल प्रजाति विकसित की जाती है। 
  • इस तकनीक के ज़रिये तैयार किये गए पौधे कीटों, सूखे जैसी पर्यावरण परिस्थिति और बीमारियों के प्रति अधिक प्रतिरोधी होते हैं। 
  • वर्तमान में कपास एक मात्र जीएम फसल है जिसे सरकार ने भारत में बेचने की अनुमति दी है | 
  • बीटी कपास,पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय की जेनेटिक इंजीनियरिंग मूल्यांकन समिति द्वारा वाणिज्यिक खेती के लिये अनुमोदित एकमात्र आनुवंशिक रूप से संशोधित फसल है।
    • पर्यावरण संरक्षण अधिनियम, 1986 के तहत वर्ष 1989 में बनाये गये सूक्ष्म जीवों, आनुवंशिक रूप से संशोधित जीवों से संबंधित नियमों द्वारा GM फसलों को मंज़ूरी प्रदान की जाती है।
  • GM फसलों का मूल्यांकन स्वास्थ्य, पर्यावरण, भोजन पर प्रभाव के आधार पर 1989 के नियमों के तहत जैव सुरक्षा समिति और आनुवंशिक इंजीनियरिंग मूल्यांकन समिति द्वारा किया जाता है।

जेनेटिक इंजीनियरिंग मूल्यांकन समिति (GEAC) से संबंधित तथ्य क्या है ?

  • जेनेटिक इंजीनियरिंग मूल्यांकन समिति को पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के अंतर्गत स्थापित किया गया है।
  • इसका कार्य अनुवांशिक रूप से संशोधित सूक्ष्म जीवों और उत्पादों के कृषि में उपयोग को स्वीकृति प्रदान करना है।
  • जेनेटिक इंजीनियरिंग मूल्यांकन समिति आनुवंशिक रूप से संशोधित बीजों के लिये स्थापित भारत का सर्वोच्च नियामक है |

गोल्डन राइस

गोल्डन राइस चर्चा में क्यों है?

  • इंटरनेशनल राइस रिसर्च इंस्टीट्यूट ने अपने सहयोगियों के साथ आईआरआरआई परिसर में नियंत्रित वातावरण में गोल्डन राइस की सफलतापूर्वक खेती की है।

गोल्डन राइस क्या है?

  • गोल्डन राइस जी॰एम॰ तकनीक से बनी धान की ऐसी किस्म है जिसमें समुचित मात्रा में ‘विटामिन-ए’ मौजूद है|
  • इसका रंग हल्दी जैसा है।

गोल्डन राइस की आवश्यकता क्या है?

  • हमें विटामिन ए की आवश्यकता है जो इस चावल से पूरा हो सकता है |
  • विश्व स्वास्थ्य संगठन के एक सर्वे के अनुसार चावल पर गुजारा करने वाले 26 देशों के 40 करोड़ से ज्यादा लोगों में विटामिन-ए की कमी है|
    • जिसके कारण प्रतिवर्ष ~5 लाख बच्चे रतौंधी या अंधेपन का शिकार हो जाते हैं और ~10 लाख बच्चे मर जाते हैं।

विटामिन ए की आवश्यकता क्यों है?

  • मनुष्य और दूसरे स्तनधारी जीव स्वयं विटामिन-ए का निर्माण नहीं कर सकते है | 
  • विटामिन-ए मनुष्य व अन्य प्राणियों के समुचित विकास के लिए आवश्यक है। 
  • यह आंखों की ज्योति को बनाये रखने, हड्डियों की वृद्धि, मांसपेशियों की मज़बूती और रक्त में कैल्सियम का स्तर सही बनाये रखने में मदद देता है।
    • साथ-साथ हमें विभिन्न रोगाणुओं से लड़ने की ताकत भी देता है।

विटामिन ए किससे मिलता है ?

  • इसे दूध व मांसाहार से प्राप्त किया जा सकता हैं |
  • या फिर लाल-नारंगी-पीले रंग की सब्जियों
    • या फलों (शकरकंद, गाजर, नारंगी, आम आदि) में
    • मौजूद ‘बीटा कैरोटिन’ को विटामिन-ए में बदलकर इस कमी को पूरा किया जा सकता हैं।

अंतर्राष्ट्रीय चावल अनुसंधान संस्थान क्या है?

  • अंतर्राष्ट्रीय चावल अनुसंधान संस्थान (आईआरआरआई) चावल की किस्मों के विकास के क्षेत्र में कार्य करने वाली एक अंतर्राष्ट्रीय कृषि अनुसंधान और प्रशिक्षण संगठन है| 
    • यहाँ पर चावल का जीन बैंक भी है|
    • यहाँ चावल की सवा लाख से ज्यादा किस्में है जिन्हें 100 देशों से इकट्ठा किया गया है।
  • 1960 में स्थापित यह केंद्र चावल अनुसंधान के मामले में सबसे पुराना अनुसंधान केंद्र है |
  • अंतर्राष्ट्रीय चावल अनुसंधान संस्थान का मुख्य उद्देश्य चावल अनुसंधान के ज़रिये भूख और गरीबी को कम करना है |

मुक्तोश्री मुक्तोश्री (Muktoshri) या IET 21845 क्या है ?

  • चावल की नई किस्म मुक्तोश्री आर्सेनिक प्रतिरोधी (Arsenic-Resistant) है।
  • मुक्तोश्री को आईईटी 21845 नाम से भी जाना जाता है। 
  • इसे पश्चिम बंगाल के कृषि विभाग के अंतर्गत आने वाले राइस रिसर्च स्टेशन, चिनसुराह और राष्ट्रीय वनस्पति अनुसंधान संस्थान, लखनऊ द्वारा संयुक्त रूप से विकसित किया गया है।
  • विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार
    • लंबे समय तक आर्सेनिक-युक्त जल के पीने एवं खाना पकाने में उपयोग करने से विषाक्तता हो सकती है।
    • आर्सेनिक के कारण त्वचा क्षतिग्रस्त एवं त्वचा कैंसर जैसी बीमारियाँ हो सकती हैं।

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