भारत-अमेरिका व्यापार परिषद

भारत-अमेरिका व्यापार परिषद
Source :भारत-अमेरिका व्यापार परिषद

भारत-अमेरिका व्यापार परिषद

  • इसकी स्थापना अमेरिका और भारतीय सरकारों के अनुरोध पर 1975 में की गई थी |  
  • भारत-अमेरिका व्यापार परिषद (USIBC) ,संयुक्त राज्य और भारत में कार्यरत, शीर्ष वैश्विक कंपनियों का प्रतिनिधित्व करता है।
  •  USIBC, उद्योगों के प्रतिनिधि के रूप में कार्य करता है और  दोनों देशों के व्यवसायों और सरकारों के बीच पूल की तरह कार्य करता है | 
  • यह परिषद सदस्यों के साथ मिलकर प्रमुख नीतिगत प्राथमिकताओं की वकालत और उसको बढ़ावा देने के लिए काम करती है।
  • परिषद, इस कार्य के माध्यम से, भारत और संयुक्त राज्य अमेरिका के बीच व्यापार और निवेश संबंधों में मजबूत एवं समावेशी विकास का समर्थन करते हैं।
  • USIBC, U.S. चेंबर ऑफ कॉमर्स का भी हिस्सा है, जो पूरे संयुक्त राज्य अमेरिका में 3,000 से अधिक स्थानीय और क्षेत्रीय कक्षों का एक व्यापक नेटवर्क रखता है।

भारत-अमेरिका व्यापार परिषद :लक्ष्य 

  • परिषद का लक्ष्य है कि भारत और संयुक्त राज्य अमेरिका के बीच विकास समर्थित नीतियो का समर्थन करके द्विपक्षीय संबंधों में वृद्धि करना है,जिससे साझा लक्ष्य ($ 500 बिलियन का व्यापार) को प्राप्त करने पर ध्यान केंद्रित करना है।
  • 12 उद्योग-केंद्रित समितियों के माधयम से परिषद की नीति और काम काफी उन्नत है  – 
    • एयरोस्पेस और रक्षा के माध्यम से ; 
    • बैंकिंग, निजी इक्विटी और डिजिटल भुगतान; 
    • डिजिटल अर्थव्यवस्था; 
    • ऊर्जा और पर्यावरण; 
    • खाद्य, कृषि और खुदरा; 
    • आधारिक संरचना; 
    • कानूनी और व्यावसायिक सेवाएँ; 
    • जीव विज्ञान; 
    • विनिर्माण; 
    • मीडिया और मनोरंजन; 
    • आपूर्ति श्रृंखला रसद; 
    • टैक्स, बीमा और रियल एस्टेट।
    • वर्तमान में परिषद की प्राथमिकताओं में निम्नलिखित शामिल हैं: 
  • अमेरिकी और भारतीय सरकारों को एक ऐसे द्विपक्षीय व्यापार सौदे के लिए संलग्न करना है जो व्यापार अवरोधों जैसे
    • चिकित्सा उपकरण मूल्य नियंत्रण,
    • कृषि वस्तुओं के लिए बाजार पहुंच,
    • सूचना और संचार प्रौद्योगिकी (आईसीटी) टैरिफ, और
    • एल्यूमीनियम और स्टील के लिए धारा 232 शुल्कों सहित समाधान करने की वकालत करता है। 
  • भारत सरकार (GOI) से आग्रह है कि लक्षित आर्थिक सुधारों को लागू करे जो भारत में व्यापार करने में अनुकूल हो और तीव्र विकास में सहायक हो |  
  • गैर-भारतीय कंपनियों को नुकसान पहुंचाने वाले संरक्षणवादी कानून का विरोध करना|
    • इसमें अनिवार्य डेटा स्थानीयकरण शामिल है,
      • जो डेटा के मुक्त प्रवाह में बाधा डालता है,
      • साइबर जोखिम को बढ़ाता है और
      • व्यापार, प्रतिस्पर्धा और नवाचार को रोकता है,
    • साथ ही साथ ई-कॉमर्स गतिविधियों को प्रतिबंधित करने वाली नीतियां भी शामिल हैं।

Leave a Reply

Your email address will not be published.