महात्मा गांधी: मेरा जीवन ही मेरा संदेश है

महात्मा गांधी: मेरा जीवन ही मेरा संदेश है
महात्मा गांधी: मेरा जीवन ही मेरा संदेश है

सूची (महात्मा गांधी)

  • शुरुआती जीवन 
  • अफ्रीका दौरा 
  • भारत आगमन 
  1. चंपारण सत्याग्रह, अहमदाबाद और खेड़ा सत्याग्रह 
  2. रॉलेट एक्ट और जलियाँवाला हत्याकांड 
  3. खिलाफत और असहयोग आंदोलन 
  4. डांडी मार्च ,गोलमेज़ सम्मेलन और  पूना पैक्ट
  5. अगस्त प्रस्ताव , व्यक्तिगत सत्याग्रह और भारत छोडो आंदोलन 
  6. माऊंटबेटन योजना और गाँधीजी की मृत्यु   
  • गाँधीजी के विचार 
  1. सर्वोदय 
  2. सत्याग्रह 
  3. अहिंसा 
  4. ट्रस्टीशिप 
  5. ग्राम स्वराज 
  6. सर्वधर्म एकता
  7. एकादश व्रत
  8. राम राज्य की परिकल्पना
  9. महिला समानता
  10. महत्वपूर्ण उद्धरण
  11. गाँधीजी का जंतर 

शुरुआती जीवन

मोहनदास करमचंद गांधी का जन्म 2 अक्टूबर 1869 को गुजरात के कठियावाड़ में पोरबंदर नामक स्थान में हुआ था | इनके पिता का नाम करमचंद गांधी और माता का नाम पुतलीबाई था | इनकी शादी कस्तूरबा बाई मकनजी से 13 वर्ष की आयु अर्थात 1881 में ही हो गया था | इनके चार संतान थे यथा मणिलाल गांधी, रामदास गांधी, देवदास गांधी और हरिलाल गांधी | इनकी औपचारिक स्कूली शिक्षा पोरबंदर, राजकोट और भावनगर में हुई | इसके बाद बैरिस्टर की पढ़ाई करने के लिए लंदन चले गए थे | इंग्लैंड से बैरिस्टरी पास करने के उपरांत भारत लौट आए परंतु भारत लौटने के बाद उन्होंने पाया कि यहां एक वकील के रूप में सफल होने की संभावना कम है| इसी समय अर्थात 1893 में गुजरात के व्यापारी दादा अब्दुल्ला द्वारा दक्षिण अफ्रीका में मुकदमा लड़ने का प्रस्ताव मिला जिसे उन्होंने तुरंत स्वीकार कर लिया था और वह दक्षिण अफ्रीका चले गए थे |

अफ्रीका दौरा 

दक्षिण अफ्रीका पहुंचने पर उन्होंने कई अमानवीय घटनाएँ देखी और स्वयं भी महसूस किया जैसे-जो एशियाई वहां मजदूरी करने के लिए गए थे वे प्रजातीय उत्पीड़न तथा भेदभाव के शिकार हो रहे थे|  वहां अंग्रेजों द्वारा काले लोगों के साथ रंग भेद की नीति अपनाई जा रही थी| गांधी जी के साथ भी कई तरह के अमानवीय व्यवहार हुआ था जिसमें एक काफी प्रचलित है| जब वह फ़र्स्ट क्लास के डिब्बे में सफर कर रहे थे तो एक अँग्रेज़ ने गाँधीजी को उनके समान के साथ स्टेशन पर बाहर निकाल दिया था | इन्हीं सब भेदभाव के खिलाफ उन्होंने संघर्ष की शुरुआत की थी | शुरुआत में गांधी जी ने याचिकाओं एवं प्रार्थना पत्रों के माध्यम से दक्षिण अफ्रीकी सरकार को अपने विचार से अवगत कराया और उन्होंने कुछ पत्र ब्रिटेन भी भेजे थे |  इन पत्रों के माध्यम से उन्होंने मांग की थी कि सरकार द्वारा इस तरह के भेदभाव को रोका जाए और गरीब भारतीयों की दशा में सुधार किया जाए | उन्होंने तर्क दिया कि यह सरकार का उत्तरदायित्व है क्योंकि भारत ब्रिटेन का उपनिवेश है | इसके बाद गाँधीजी ने वहां रह रहे भारतीयों को संगठित करना शुरू किया और इसके साथ ही ‘नटाल भारतीय कांग्रेस’ की स्थापना किया था | इंडियन ओपिनियन नामक पत्र का प्रकाशन जन-मानस को जागरूक करने के लिए शुरू किया था | वहां रह रहे एशियाई लोगों के सामने आगे चलकर लगभग 1905 -06 के बाद और चुनौतियाँ आई जिसे गाँधीजी ने एक नए रणनीति के तहत संघर्ष शुरू किया था |  इस दौरान गाँधीजी ने अहिंसात्मक प्रतिरोध या सविनय अवज्ञा की नीति अपनाई जिसे गांधी जी ने सत्याग्रह का नाम दिया| यह चुनौतियाँ मुख्यतः 

  1. पंजीकरण प्रमाण पत्र के विरुद्ध सत्याग्रह(1906): इसमें भारतीयों के लिए अपने अंगूठे के निशान वाले पंजीकरण प्रमाण पत्र को हर समय अपने साथ रखना अनिवार्य कर दिया गया  था |  
  2. पोल टैक्स तथा भारतीय विवाहों  को अप्रमाणित करने के विरुद्ध अभियान(1913) : इसमें भारतीयों का करारनामा समाप्त होने पर उन पर सरकार द्वारा उनकी आय से काफी अधिक कर आधिरोपित कर दिया गया और जो शादी ईसाई  पद्धति से नहीं संपन्न हुए थे तथा जिनका पंजीकरण नहीं हुआ था उन सभी शादियों को उच्चतम न्यायालय द्वारा अवैध घोषित कर दिया गया था | उपरोक्त रणनीति द्वारा गाँधीजी ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान पाई क्योंकि दक्षिण अफ्रीका की सरकार को भारतीयों पर लगाया गया कर वापस लेना पड़ा और इसको अंतर्राष्ट्रीय मीडिया जैसे इंग्लैंड और अन्य जगहों के अखबारों में काफी ज्यादा सराहा गया जिससे गांधी जी को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर लोग जानने लगे थे | दक्षिण अफ्रीका के अपने अनुभव और आत्मविश्वास के साथ जनवरी 1915 में भारत लौटे और उनका एक नया सफर शुरू हुआ |

चंपारण सत्याग्रह, अहमदाबाद और खेड़ा सत्याग्रह

गाँधीजी दक्षिण अफ्रीका के अपने संघर्षों और कामयाबी के कारण भारत में भी लोकप्रिय थे |  गांधी जी भारत आने के बाद सबसे पहले पूरे भारत का भ्रमण किया था | इस यात्रा के दौरान गाँधीजी ने भारत में विद्यमान गरीबी और असमानता को करीब से देखा था | इसके बाद गाँधीजी ने इस दशा में परिवर्तन लाने के लिए संघर्ष शुरू किया |  शुरुआत उन्होंने चंपारण सत्याग्रह, अहमदाबाद और खेड़ा सत्याग्रह कर के किया और लोगों को न्याय दिलाया | इन तीनों की थोड़ी चर्चा कर लेते हैं 

  1. चंपारण सत्याग्रह: इसमें दो मुद्दे सम्मिलित थे पहला, ‘तिनकठिया पद्धति’ जिसके अंतर्गत किसानों को अपनी भूमि के 3/20वे  हिस्से पर नील की खेती करना अनिवार्य था | दूसरा, लगान में अत्यधिक वृद्धि | इन दोनों ही चुनौती में सत्याग्रह के माध्यम से सफलता पाई |  
  2. अहमदाबाद मिल हड़ताल: इसमें मुद्दा प्लेग बोनस के प्रतिशत को लेकर था और इसमें भी गाँधीजी ने मज़दूरों के हक में लड़ाई लड़ी और कामयाबी मिली |  
  3. खेड़ा सत्याग्रह: इसमें सरकार द्वारा राजस्व संहिता के अनुसार कार्य नहीं करने से किसानों में असंतोष था और इसमें भी गांधीजी ने हस्तक्षेप किया और न्यायोचित परिणाम हासिल किया अर्थात जो लगान देने में सक्षम थे उससे ही लगान लिया जाए | 

रॉलेट एक्ट और जलियाँवाला हत्याकांड

ब्रिटिश सरकार ने भारत में उभर रहे राष्ट्रीय आंदोलन को बलपूर्वक या कानून के सहारे दबाने के क्रम में मार्च 1919 में एक कानून पास कर दिया जिसे राँलेट एक्ट के नाम से जाना जाता है | इसके अनुसार ब्रिटिश सरकार को यह अधिकार प्राप्त हो गया था कि वह किसी भी भारतीय पर अदालत में बिना केस फाइल किए उसे गिरफ्तार किया जा सकता था |इसके विरोध में गांधी जी ने सत्याग्रह प्रारंभ करने का निर्णय लिया था परन्तु तय तिथि के अनुसार सत्याग्रह 6 अप्रैल से शुरू होना था लेकिन असमंजस के कारण, तारीख से पहले ही आंदोलन शुरू हो गया और हिंसक होता गया | इसको रोकने के लिए सरकार को आर्मी का सहारा लेना पड़ा था जिससे इतिहास में अंग्रेजी सरकार द्वारा किया गया सबसे अमानवीय कृत्य के रूप में दर्ज हो गया | यह 13 अप्रैल 1919 को अमृतसर के जलियांवाला बाग में एक सार्वजनिक सभा पर जनरल डायर ने सरकारी आदेश की अवहेलना मान निहत्थे लोगों पर गोली चलाने के आदेश दे दिए थे |इसमें लगभग 1000 से ज्यादा लोग मारे गए थे |आंदोलन हिंसात्मक होने के कारण गांधीजी ने 18 अप्रैल 1919 को सत्याग्रह समाप्त घोषित कर दिया था | 

खिलाफत और असहयोग आंदोलन

प्रथम विश्व युद्ध के बाद उत्पन्न वैश्विक परिस्थितियों के साथ आंतरिक परिस्थितियां ने एक नए आंदोलन की नींव रख दी थी | इसी के परिणाम स्वरूप खिलाफत और असहयोग आंदोलन (1919 -1922) शुरू हुआ था और धीरे-धीरे जनता के अपार समर्थन के कारण यह जन आंदोलन का रूप धारण कर लिया था | गांधीजी खिलाफत आंदोलन के प्रति पूर्ण आशावादी थे क्योंकि इससे हिन्दू -मुस्लिम एकता में बढ़ोतरी हो गयी थी तथा  इससे भी आगे बढ़कर सरकार के विरुद्ध सत्याग्रह और असहयोग आंदोलन प्रारंभ करना चाहते थे | गांधीजी असहयोग आंदोलन के अग्रणी नेता थे | इस आंदोलन को गांधी जी ने जन आंदोलन बनाने के लिए कई सभाओं को संबोधित किया, सैकड़ों लोगों से मुलाकात किया साथ ही उन्होंने पूरे देश का दौरा किया था | इस आंदोलन की सफलता ने गांधीजी का कद और स्वीकार्यता और बढ़ा दिया था | सरकार का रूख, लोगों की मांगों के प्रति, नकारात्मक नजर आ रहा था इसलिए 1 फरवरी 1922 को गांधी जी ने घोषणा की कि यदि सरकार हमारी मांगों को नज़रअंदाज़ करती है तो हम सविनय अवज्ञा आंदोलन करने के लिए विवश हो जाएंगे | सविनय अवज्ञा आंदोलन शुरू होने से पहले ही उत्तर प्रदेश के गोरखपुर जिले के चौरी-चौरा नामक एक छोटे से गांव में एक बड़ी हिंसक घटना घट गई जिसमें कई पुलिसकर्मी मारे गए थे | इस घटना की खबर से गांधीजी दुखी हो गए और उन्होंने आंदोलन वापस लेने की घोषणा कर दी थी |  यह दर्शाता है कि गांधीजी अहिंसा के प्रति कितना समर्पित थे | इसी घटना कारण मार्च 1922 को गांधीजी को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया था |हालांकि उनको स्वास्थ्य के कारण 2 साल बाद रिहा कर दिया गया था |गांधी जी ने कहा था कि “मैं हर प्रकार का दमन, हर प्रताड़ना, हर उत्पीड़न सहन कर सकता हूं, यहां तक कि अपनी मृत्यु का वरण भी कर सकता हूं लेकिन आंदोलन हिंसक हो जाए यह बर्दाश्त नहीं कर सकता”(16 फरवरी 1922)

डांडी मार्च ,गोलमेज़ सम्मेलन और  पूना पैक्ट

1928 में, कांग्रेस द्वारा ब्रिटिश सरकार के समक्ष कुछ माँगे रखी गई थी जैसे- डोमिनियन स्टेटस का दर्जा और 1929 में पूर्ण राज्य या पूर्ण स्वतंत्रता की मांग रखी गई थी | इसके बाद गांधीजी ने 11 सूत्री माँगे सरकार के सामने रखी परंतु सरकार ने मांगों पर कोई ध्यान नहीं दिया | इसके अतिरिक्त और भी कुछ परिस्थितियां उत्पन्न हुई जिसके फलस्वरूप गांधी जी को एक और आंदोलन शुरू करना पड़ा था | इसको सविनय अवज्ञा आंदोलन कहते हैं | इस आंदोलन को गांधी जी ने नमक कानून तोड़कर शुरू किया था |  इसकी शुरुआत 12 मार्च 1930 को साबरमती आश्रम से अपने 78 समर्थकों के साथ, जिसमें महिलाएं एवं पुरूष दोनों सम्मिलित थे,डांडी के लिए पद-यात्रा प्रारंभ की और 24 दिनों में 240 किलोमीटर की यात्रा पूरी करने के बाद 6 अप्रैल को गांधी जी ने समुद्र में नमक बनाकर कानून तोड़ा | इस आंदोलन को आगे कैसे ले जाना है इसकी भी रणनीति बनाई गई थी जैसे जहां मुमकिन हो नमक कानून तोड़ना, विदेशी वस्तु के सामने धरना प्रदर्शन करना आदि | हर आंदोलन की तरह इस आंदोलन के बाद सरकार ने विभिन्न मुद्दों पर बातचीत करने के लिए गोलमेज़ सम्मेलन का आयोजन किया था परंतु मांग अपेक्षा के अनुरूप नहीं मानी गई जिससे गोलमेज सम्मेलन का शुरुआत में बहिष्कार किया गया था |  परंतु गांधी-इरविन समझौता होने के बाद गांधी जी द्वितीय गोलमेज सम्मेलन में भाग लेने के लिए तैयार हो गए थे |यह सम्मेलन 17 सितंबर 1931 से 1 दिसंबर 1931 तक चला | इस सम्मेलन में गांधीजी राजपूताना नामक जहाज़ से लंदन पहुंचे थे परंतु इस सम्मेलन में कुछ हासिल न कर पाने के साथ और भी कई मुद्दों पर असहमति के कारण तृतीय गोलमेज सम्मेलन में भाग नहीं लिया गया था | अप्रैल 1934 में गांधी जी ने सविनय अवज्ञा आंदोलन वापस लेने का निर्णय लिया था |गोलमेज सम्मेलन में कुछ ऐसे निर्णय लिए गए जो गांधीजी को स्वीकार नहीं था खासकर दलित जाति के संदर्भ में | गांधीजी इसके विरोध में 20 सितंबर 1932 से आमरण अनशन पर बैठ गए क्योंकि इनका मानना था कि इस सांप्रदायिक निर्णय से राष्ट्रीय एकता एवं भारतीय राष्ट्रवाद कमजोर हो जाएगा | इसके बाद सवर्ण हिंदुओं तथा दलितों के मध्य एक समझौता किया गया | इसी को ‘पूना समझौता’ के नाम से जाना जाता है | गांधीजी ने भारतीय समाज की अश्पृश्यता नामक समस्या का हल करने का निश्चय  कारावास के दौरान ही किया और इसके लिए उन्होंने सितंबर 1932 में ‘अखिल भारतीय अस्पृश्यता विरोधी’ का गठन किया | इसके साथ ही हरिजन नामक साप्ताहिक पत्रिका का प्रकाशन जनवरी 1933 से शुरू कर दिया था|उन्होंने हिन्दू समाज में हो रहे अत्याचार तथा भेदभाव की तीव्र भर्त्सना किया |उन्होंने हिन्दू समाज को संदेश दिया की “यदि अश्पृश्यता का रोग समाप्त नहीं हुआ तो हिन्दू समाज समाप्त हो जायेगा | यदि हिन्दूवाद को जीवित रखना है तो अश्पृश्यता को समाप्त करना ही होगा |” अश्पृश्यता उन्मूलन के अपने उद्देश्य की पूर्ति के लिए 7 नवंबर 1933 को वर्धा से गांधी जी ने अपनी हरिजन यात्रा की शुरुआत किया और इसे 1934 तक पूरे देश में जागरूकता अभियान चलाया था | इस दौरान उन्होंने हजारों किलोमीटर की पैदल यात्रा किया था | 

अगस्त प्रस्ताव , व्यक्तिगत सत्याग्रह और भारत छोडो आंदोलन 

द्वितीय विश्व-युद्ध शुरू होने के बाद अंग्रेजी सरकार 8 अगस्त 1940 को कांग्रेस के सामने एक प्रस्ताव रखा जिसे अगस्त प्रस्ताव के नाम से जाना जाता है | परंतु कांग्रेस द्वारा इस प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया गया | इसके बाद सरकार ने कड़ा रुख अख्तियार कर लिया और उसने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, प्रेस की स्वतंत्रता आदि अधिकारों पर प्रतिबंध लगाने लगा जिसकी वजह गांधीजी ने फिर से आंदोलन का सहारा लिया |  इस बार गांधी जी द्वारा व्यक्तिगत सत्याग्रह प्रारंभ किया गया | इसमें हर इलाके में कुछ चुने हुए लोग व्यक्तिगत सत्याग्रह प्रारंभ करते थे | 17 अक्टूबर 1940 को विनोबा भावे पहले सत्याग्रही बने | इसके बाद ब्रिटिश सरकार ने मार्च 1942 में सर स्टैफर्ड क्रिप्स के नेतृत्व में एक मिशन भेजा गया था जिसे क्रिप्स मिशन के नाम से जाना जाता है | इस मिशन में भी कुछ प्रस्ताव आया था जिसको भारतीय राष्ट्रवादियों ने अस्वीकार कर दिया अर्थात सभी दलों ने इस प्रस्ताव का विरोध किया | इस मिशन के असफल होने के बाद गांधी जी ने एक और आंदोलन शुरू करने का प्रस्ताव तैयार किया जिसको ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ कहते हैं |  4 जुलाई 1942 को कांग्रेस कार्यसमिति ने वर्धा की अपनी बैठक में संघर्ष के गाँधीवादी प्रस्ताव को अपनी स्वीकृति दे दी | 8 अगस्त 1942 को घोषणा की गई कि भारत में ब्रिटिश शासन को तुरंत समाप्त किया जाए | इस अवसर पर गांधी जी ने लोगों से कहा था “एक मंत्र है, छोटा सा मंत्र, जो मैं आपको देता हूं| उसे आप अंकित कर सकते हैं और प्रत्येक सांस द्वारा व्यक्त कर सकते हैं यह मंत्र है: ‘करो या मरो’|” या तो हम भारत को आज़ाद कराएँगे या इस प्रयास में अपनी जान दे देंगे; अपनी गुलामी का स्थायित्व देखने के लिए हम जिंदा नहीं रहेंगे |  

माऊंटबेटन योजना और गाँधीजी की मृत्यु

अंततः माउंटबेटन प्लान के तहत भारत का विभाजन, भारत और पाकिस्तान नाम के दो स्वतंत्र देश में कर दिया गया | यह बँटवारा धार्मिक आधार पर हुआ था | राजधानी दिल्ली में आज़ादी का जश्न मन रहा था उसी समय गांधीजी दिल्ली शहर छोड़कर कोलकाता रवाना हो गए ताकि वहाँ हो रहे हिंसा को रोक कर शांति स्थापित कर सकें | बँटवारे की वजह से काफी हिंसा हुई थी जिसमे लाखों लोगों ने जान गँवाई थी | इसके बाद गांधीजी कोलकाता से दिल्ली लौट आए जिससे जो मुसलमान पाकिस्तान जाने की बजाय भारत में ही रहने का फैसला किया था उनकी सुरक्षा सुनिश्चित किया जा सके |इसके लिए गांधीजी ने अनशन करना शुरू कर दिया था | इसके कुछ दिन बाद गांधीजी दिल्ली के बिड़ला हाउस में एक प्रार्थना सभा में जा रहे थे उसी दौरान उनकी हत्या कर दी गई थी | भारतीयों के लिए महात्मा गांधी की मौत अविश्वसनीय तकलीफदेह थी क्योंकि उनके महात्मा के लिए पूरा देश ही परिवार था और वो पूरे देश के लिए गौरव थे | गांधी जी का शरीर 31 जनवरी 1948 को पंच-तत्व में विलीन हो गई परंतु उनके विचार और आदर्श हमेशा हर इंसान में जीवित रहेंगे | 

सर्वोदय 

सर्वोदय का अर्थ है सबका उदय/ उत्थान | सर्वोदय वस्तुतः समाज के समस्त वर्गों एवं उनके जीवन के सभी पक्षों के उत्थान का एक अद्वितीय मानवीय प्रयास है | इसका लक्ष्य एक ऐसे सामाजिक व्यवस्था का निर्माण करना है जिसमें शोषण, संघर्ष एवं प्रतियोगिता के स्थान पर प्रेम एवं सहयोग, विषमता के स्थान पर समता, वर्ग हित के स्थान पर सर्वहित की मंगल कामना निहित होती है | गांधीजी सर्वोदय को, जीवन दर्शन के मूलभूत सिद्धांत के रूप में स्वीकार करते थे | गांधीजी का मानना था कि पूरी मानव जाति का कल्याण तभी संभव है जब विश्व के अंतिम व्यक्ति तक का कल्याण हो | गांधीजी सर्वोदयी समाज में सभी व्यक्तियों के श्रम करने पर बल देते थे ताकि उनका आर्थिक विकास सुनिश्चित हो और वह आत्मनिर्भरता प्राप्त कर सकें |सर्वोदय समाज में विषमता को अहिंसा के माध्यम से खत्म करने का संदेश देता है अर्थात यह साधन और साध्य दोनों की पवित्रता की बात करता है|  गांधी जी कहते थे कि “समाजवाद का प्रारंभ प्रथम समाजवादी से होता है | अगर एक भी ऐसा समाजवादी हो जो उस पर शून्य बढ़ाए जा सकते हैं | हर शून्य से उसकी कीमत 10 गुना बढ़ जाएगी लेकिन अगर पहला अंक शून्य हो तो उसके आगे कितने ही शून्य बढ़ाए जाएं उसकी कीमत फिर भी शून्य ही रहेगी”  |

सत्याग्रह

गांधीजी सत्य-अहिंसा, साधन-साध्य की श्रेष्ठता एवं व्यक्ति की नैतिक पवित्रता में विश्वास करते थे | इन्हीं विश्वासों के आधार पर बुराई के प्रतिरोध हेतु एक नया मार्ग प्रस्तुत किया जिसे ‘सत्याग्रह’ कहा जाता है | सत्याग्रह का शाब्दिक अर्थ है सत्य के लिए आग्रह |  इसमें अहिंसा के माध्यम से असत्य या असत्य पर आधारित कृत्य का विरोध किया जाता है | गांधीजी का मानना था कि प्रत्येक व्यक्ति के अंदर सत्यानुभूति की संभावना विद्यमान है क्योंकि प्रत्येक व्यक्ति के अंदर आत्मा के रूप में ईश्वरीय अंश विद्यमान है| इसलिए गांधीजी कहते हैं “विरोध, अनैतिकता या पाप का होना चाहिए ,अनैतिक व्यक्ति या पापी का नहीं|”  गांधी जी सत्याग्रह के माध्यम से दुराचारी, पापी आदि का हृदय परिवर्तन करने की बात करते हैं जिससे इंसान अपने अंदर की बुराई का परित्याग कर सकता है | इसमें पाप और बुराई को दूर करने के लिए पापी को दंड या अपमानित करने के बजाय स्वयं को दुख और कष्ट में डालकर विजय प्राप्ति का प्रयास किया जाता है| इससे परस्पर सहयोग, त्याग एवं सदभावना का विस्तार होता है|  

सत्याग्रही की विशेषताएँ:

  • सत्याग्रही सदैव सच्चा ,अहिंसक एवं निडर रहता है|  
  • सत्याग्रही में बुराई के विरुद्ध संघर्ष करते समय सभी प्रकार की यातनाएँ सहने की शक्ति होनी चाहिए|  
  • सत्याग्रही बुराई या पाप करने वालों से भी प्रेम और अनुराग रखता है |  

अहिंसा

गांधीजी के अनुसार हिंसा पशुओं का प्राकृतिक स्वभाव है जबकि अहिंसा मानव जाति का गुण है | गांधीजी के अनुसार हत्या, लूटपाट ही मात्र हिंसा नहीं है बल्कि प्रत्येक शोषण, अन्याय, अत्याचार एवं विषमता में हिंसा व्याप्त है | गांधी जी ने समाज और राज्य के अस्तित्व के लिए भी अहिंसा एक आवश्यक मूल्य बताया है | दूसरे के लिए अहित न सोचना, कटुवचन का प्रयोग न करना, किसी भी प्राणी पर हिंसा न करना आदि भी अहिंसा में आते हैं |गांधी जी न तो एक दार्शनिक थे और न ही एक राजनीतिज्ञ। वे सत्य के सबसे बड़े साधक थे। सत्य सबको जोड़ता है क्योंकि यह केवल एक और एक ही हो सकता है। आप किसी व्यक्ति का सर काट सकते हैं पर उसके विचारों को नहीं काट सकते। अहिंसा सत्य का ही दूसरा पहलू है।अहिंसा प्रेम है जो जीवन का सार भी है।अहिंसा के इसी सिद्धांत को अपनाते हुए गांधी जी ने बुराई और असत्य के खिलाफ प्रतिरोध शुरू किया।उनका सत्याग्रह अपार प्रेम और करूणा से प्रेरित है। उन्होंने पाप का विरोध किया पापी का नहीं, बुराई का विरोध किया बुरा करने वाले का नहीं। उनके लिए सत्य खुद भगवान थे और इसीलिए वे भगवान के आदमी थे। सत्य न तो हमारा है और न ही तुम्हारा। यह न तो पश्चिम वालों का है और न तो पूरब वालों का।

ट्रस्टीशिप

गांधीजी आर्थिक न्याय हेतु अर्थात समाज में आर्थिक विषमता निवारण हेतु ‘ट्रस्टीशिप’ की अवधारणा का समर्थन करते हैं | इसमें धनी व्यक्ति को अपनी संपत्ति का उपयोग अपनी आवश्यकता के अनुरूप करना चाहिए तथा शेष संपत्ति को समाज की धरोहर मानकर उसका उपयोग समाज के हित में करना चाहिए| अतः धनी व्यक्ति को अपनी अर्जित संपत्ति के अनावश्यक उपयोग का नैतिक अधिकार नहीं है क्योंकि उसे अपनी अतिरिक्त संपत्ति का केवल संरक्षक होना चाहिए |  गांधीजी उत्पादन दृष्टिकोण से पूंजीवाद और वितरण के दृष्टिकोण से समाजवाद की बात करते हैं | 

ग्राम स्वराज्य 

ग्राम स्वराज्य की गांधीजी की कल्पना थी कि वह एक ऐसा पूर्ण प्रजातंत्र होगा, जो अपनी अहम ज़रूरतों के लिए अपने पड़ोसी पर भी निर्भर नहीं करेगा और फिर बहुत सारी  दूसरी ज़रूरतों के लिए-जिसमें दूसरों का सहयोग अनिवार्य होगा वह परस्पर सहयोग से काम लेगा।(हरिजन सेवक 2.8.1942)

सर्वधर्म एकता

गांधीजी मानते थे कि स्वराज्य का अर्थ है हिंदू, मुस्लिम, सिख, पारसी, ईसाई, यहूदी सभी धर्मों के लोग अपने धर्मों का पालन कर सकें और ऐसा करते हुए एक-दूसरे की रक्षा और एक-दूसरे के धर्म का आदर करें। उन्होंने बढ़ती हुई साम्प्रदायिकता का  कारण, भय, अविश्वास और प्रतिशोध को माना। उन्होंने कहा कि हिंदू-मुस्लिम एवं सभी सम्प्रदायों के प्रयोजन, हित एवं संगठन में समग्र राष्ट्रीय हित की वृध्दि संभव है जिसे स्पष्ट करते हुए उन्होंने कहा कि हिंदू-मुस्लिम एकता ही स्वराज्य है।

एकादश व्रत

गांधीजी के एकादश व्रत थे जो सत्य, अहिंसा, ब्रह्मचर्य, अस्तेय, आचार, अपरिग्रह, अभय, अस्पृश्यता निवारण, शरीरश्रम, सर्वधर्म समभाव और स्वदेशी हैं। सत्याग्रह को तभी जाना जा समझा सकता है जब समग्रता के साथ सत्य को जाना जाए।ईर्ष्या, द्वेष, अविश्वास जैसी मानसिक हिंसा को भी वे उतना ही घातक समझते थे जितना कि शारीरिक हिंसा को। कहने का अर्थ यह है कि वे किसी भी रूप में हिंसा का बचाव करने के पक्षधर कभी नहीं रहे। गांधीजी ने सत्याग्रह में भी इसे और स्पष्ट किया है। उन्होंने लिखा : सत्याग्रह शब्द का उपयोग अक्सर बहुत शिथिलतापूर्वक किया जाता है और छिपी हुई हिंसा को भी सत्याग्रह का नाम दे दिया जाता है। लेकिन इस शब्द का रचयिता होने के नाते मुझे यह कहने कि अनुमति मिलनी चाहिए कि उसमें छिपी हुई अथवा प्रकट, सभी प्रकार की हिंसा का, फिर वह कर्म की हो या मन और वाणी की हो, पूरा बहिष्कार है।

रामराज्य की परिकल्पना

गांधीजी ने अपने विचारों में स्वराज्य के साथ आदर्श समाज, आदर्श राज्य अथवा रामराज्य का कई बार प्रयोग किया है, जो वास्तव में लगभग एक हैं। रामराज्य को बुराई पर भलाई की विजय के रूप में देखते हैं। स्वराज्य को वे ईश्वर के राज्य के रूप में मानते हैं क्योंकि उनके लिए ईश्वर का अर्थ है सत्य। अर्थात सत्य ही ईश्वर है- सत्य ही चिरस्थायी है। सत्य की व्याख्या करते हुए गांधी जी यह भी कहते हैं कि किसी विशेष समय पर एक शुद्ध हृदय जो अनुभव करता है वह सत्य है और उस पर अडिग रह कर ही शुद्ध सत्य प्राप्त किया जा सकता है। वे और आगे इसे स्पष्ट करते हुए कहते हैं कि सत्य की साधना आत्मपीड़न एवं त्याग से ही संभव है।

महिला समानता

गांधीजी बाल विवाह के घोर विरोधी थे और इसे हानिकारक प्रथा मानते थे। उन्होंने कहा कि धर्म में जोर-ज़बरदस्ती का तो हम विरोध करते हैं परन्तु धर्म के नाम पर अपने देश की तीन लाख से अधिक ऐसी बाल विधवाओं के ऊपर हमने वैधव्य का बोझ लाद रखा है जो बेचारी विवाह-संस्कार का अभिप्राय तक नहीं समझ सकतीं। बालिकाओं पर वैधव्य लादना तो पाश्विक अपराध है।उन्होंने कहा कि स्त्रियों को अबला जाति का मानना उनका अपमान है। ऐसा कहकर पुरुष, स्त्रियों के प्रति अन्याय ही करते हैं। उन्होंने यह भी कहा कि यदि मैं स्त्री के रूप में जन्मा होता तो पुरुष के इस दंभ के विरुद्ध कि स्त्री पुरुष के मनोरंजन की वस्तु है, विद्रोह कर देता।गांधीजी बाल विवाह, पर्दा-प्रथा, दहेज प्रथा और वेश्यावृत्ति के घोर विरोधी थे किंतु विधवा विवाह के प्रबल समर्थक थे। 

महत्वपूर्ण उद्धरण

“आप जो भी करते हैं वह कम महत्वपूर्ण हो सकता है, लेकिन सबसे महत्वपूर्ण यह है कि आप कुछ करें |”

महात्मा गांधी

“व्यक्ति की पहचान उसके कपड़ों से नहीं उसके चरित्र से होती है|”

महात्मा गांधी

“पहले, लोग आप पर ध्यान नहीं देंगे, फिर आप पर हंसेंगे, फिर आपसे लड़ेंगे और तब आप जीत जाएंगे|” 

महात्मा गांधी

“प्रसन्नता ही एकमात्र ऐसा इत्र है जिसे आप दूसरों पर छिड़कते हैं तो कुछ बूंदे आप पर भी पड़ती हैं|”

महात्मा गांधी

“आज़ादी का कोई मतलब नहीं, यदि इसमें गलती करने की आज़ादी शामिल न हो|”

महात्मा गांधी

“आँख के बदले आँख, पूरे विश्व को अंधा बना देगी|”

महात्मा गांधी

“जो समय बचाते हैं, वे धन बचाते हैं और बचाया धन, कमाए हुए धन के समान महत्वपूर्ण है|”

महात्मा गांधी

“ऐसे जिये जैसे कि आपको कल मरना है और सीखें ऐसे जैसे आपको हमेशा जीवित रहना है|”

महात्मा गांधी

विश्वास करना एक गुण है,अविश्वास दुर्बलता की जननी है|” 

महात्मा गांधी

“व्यक्ति अपने विचारों के सिवाए कुछ नहीं है, वह जो सोचता है, वह बन जाता है|” 

महात्मा गांधी

“कमजोर कभी क्षमाशील नहीं हो सकता है, क्षमाशीलता ताक़तवर की निशानी है|”  

महात्मा गांधी

“ताकत शारीरिक शक्ति से नहीं आती है, यह अदम्य इच्छाशक्ति से आती है|” 

महात्मा गांधी

“धैर्य का छोटा हिस्सा भी एक टन उपदेश से बेहतर है” 

महात्मा गांधी

“गौरव, लक्ष्य पाने के लिए कोशिश करने में हैं, न कि लक्ष्य तक पहुंचने में|”  

महात्मा गांधी

“हम जो करते हैं और हम जो कर सकते हैं, इसके बीच का अंतर दुनिया की ज्यादातर समस्याओं के समाधान के लिए पर्याप्त होगा|” 

महात्मा गांधी

“किसी देश की महानता और उसकी नैतिक उन्नति का अंदाजा हम वहां जानवरों के साथ होने वाले व्यवहार से लगा सकते हैं|” 

महात्मा गांधी

“कोई कायर प्यार नहीं कर सकता है, यह तो बहादुर की निशानी है|” 

महात्मा गांधी

“बापू ने कहा कि स्वास्थ्य ही असली संपत्ति है, न कि सोना और चाँदी|”

महात्मा गांधी

“यदि मनुष्य सीखना चाहे, तो उसकी हर भूल उसे कुछ शिक्षा दे सकती है|”

महात्मा गांधी

“जिंदगी का हर दिन ऐसे जीना चाहिए जैसे कि यह तुम्हारे जीवन का आखिरी दिन होने वाला है|” 

महात्मा गांधी

“आपको खुद में ऐसे बदलाव करने चाहिए जैसा आप दुनिया के बारे में सोचते हैं|” 

महात्मा गांधी

“आप प्रत्येक दिन अपने भविष्य की तैयारी करते हैं|” 

महात्मा गांधी

“पुस्तकों का मूल्य रत्नों से भी अधिक है, क्योंकि पुस्तकें अन्तःकरण को उज्ज्वल करती हैं|”

महात्मा गांधी

“लम्बे-लम्बे भाषणों से कहीं अधिक मूल्यवान है इंच भर कदम बढ़ाना|”

महात्मा गांधी

“काम की अधिकता ही नहीं, अनियमितता भी आदमी को मार डालती है|”

महात्मा गांधी

“अपनी गलती को स्वीकारना, झाड़ू लगाने के सामान है जो धरातल की सतह को चमकदार और साफ कर देती है|”

महात्मा गांधी

“अक्लमंद काम करने से पहले सोचता है और मूर्ख काम करने के बाद|”

महात्मा गांधी

“किसी भी काम को या तो प्रेम से करें या उसे कभी करें ही नहीं|”

महात्मा गांधी

गाँधी जी का जंतर

गांधीजी ने कहा था,”मैं तुम्हें एक जंतर देता हूं । जब भी तुम्हें संदेह हो या जब अहं तुम्हारे ऊपर हावी होने लगे तो यह कसौटी अजमाओ| जो सबसे गरीब और कमजोर आदमी/औरत तुमने देखा हो, उसकी शक्ल याद करो और अपने दिल से पूछो कि जो कदम उठाने का तुम विचार कर रहे हो, वह उस आदमी के लिए कितना उपयोगी होगा? क्या उसे कुछ लाभ पहुँचेगा? क्या उससे वह अपने ही जीवन व भाग्य पर कुछ काबू कर सकेगा? दूसरे शब्दों में, क्या इससे करोड़ों भूखे, प्यासे लोगों को स्वराज्य (आज़ादी) मिल सकेगा? तब तुम देखोगे कि तुम्हारा संदेह मिट रहा है और अहं समाप्त होता जा रहा है।”

महात्मा गांधी

1 thought on “महात्मा गांधी: मेरा जीवन ही मेरा संदेश है”

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