वाह्य अंतरिक्ष संधि (Outer Space Treaty)

1957 में सोवियत संघ द्वारा स्पूतनिक लॉन्च करने के एक वर्ष बाद, संयुक्त राष्ट्र महासभा ने ‘वाह्य अंतरिक्ष के शांतिपूर्ण उपयोग पर एक तदर्थ समिति बनाई थी’ (ad hoc Committee on the Peaceful Uses of Outer Space-COPUOUS)। 1960 में, अन्तरिक्ष कानून (space law) तथा वाह्य अंतरिक्ष संधि (Outer Space Treaty) के लिए एक अंतर्राष्ट्रीय संस्थान ,जोकि एक गैर सरकारी संगठन है , को अंतरिक्ष कानून बनाने की प्रक्रिया में तथा अंतर्राष्ट्रीय सहयोग को बढ़ावा देने का उत्तरदायित्व सौंपा गया था। 

space law
वाह्य अंतरिक्ष संधि (Outer Space Treaty)

अंतरिक्ष कानून (space law) का क्षेत्र कुछ सवालों जैसे  संपत्ति के अधिकार, अंतरिक्ष में हथियार, अंतरिक्ष यात्रियों की सुरक्षा और अन्य मामलों से निपटने के लिए विकसित हुआ है। हालांकि, अंतरिक्ष कानून (space law) को  परिभाषित करना एक चुनौतीपूर्ण कार्य है ।इस उद्देश्य के लिए कई देशों द्वारा विभिन्न संधियों पर स्वेच्छा से हस्ताक्षर किए गए थे | 

The United Nations and the Outer Space Treaty (संयुक्त राष्ट्र और वाह्य अंतरिक्ष संधि)

COPUOUS को 1958 में स्थापित किया गया था और 1959 में इसे स्थायी बना दिया गया था। 2018  तक, इसमें 92 सदस्य हैं, जिनमें प्रमुख राष्ट्र जैसे संयुक्त राज्य अमेरिका (NASA), रूस (Roscosmos), जापान, चीन, कनाडा, ब्राजील, ऑस्ट्रेलिया, भारत और यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी के सदस्य राज्य,शामिल हैं। भारत शुरू से इस समिति का सदस्य है |

संयुक्त राष्ट्र इस समिति (COPUOUS) को “केंद्र बिंदु” के रूप में वर्णित करता है जहां सभी सदस्य राज्य बातचीत के जरिये यह तय करते है  कि अंतरिक्ष का उपयोग बिना किसी विवाद के कैसे किया जाए। COPUOUS के कर्तव्यों में पहला, अंतरिक्ष के बारे में जानकारी का आदान-प्रदान करना, सरकार और गैर-सरकारी संगठनों के अंतरिक्ष से जुड़े कार्यो पर नज़र रखना और अंतर्राष्ट्रीय सहयोग को बढ़ावा देना शामिल है। COPUOUS ने 1962 में  दो उप-समिति का गठन किया था यथा कानूनी मुद्दों और वैज्ञानिक तथा तकनीकी विकास से निपटने के लिए | इसके लिए सचिवालय संयुक्त राष्ट्र कार्यालय वाह्य अंतरिक्ष मामलों (United Nations Office for Outer Space Affairs -UNOOSA) द्वारा प्रदान किया गया हैं।

COPUOUS के माध्यम से हमें  पाँच संधियों और पाँच सिद्धांतों को वास्तविक रूप दिया जा सका है जो मुख्यतः अंतरिक्ष अन्वेषण के  संचालन उपयोगी हैं। सबसे मूलभूत संधि यथा राज्यों की गतिविधियों, जिसमे वाह्य अंतरिक्ष का उपयोग और उसमे खोज को प्रशासित करने वाली सिद्धांतों की  संधि है | इसमें चंद्रमा और अन्य खगोलीय पिंड भी शामिल है | संक्षेप में इसे “वाह्य अंतरिक्ष संधि (Outer Space Treaty)” कहते हैं | इसे 1967 में संस्तुति मिला  था | इसको 1962 में ही एक कानूनी सिद्धांत के रूप में संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा स्वीकार किया जा चुका था ।

संधि में कई  बिंदु हैं और इनमें से  कुछ प्रमुख इस प्रकार हैं:

  • सभी देशों को  अंतरिक्ष में अन्वेषण करने के का समान अधिकार  है और किसी भी देश द्वारा वहाँ पर संप्रभु दावे नहीं किए जा सकते। अंतरिक्ष से जुड़ीं गतिविधियाँ , सभी देशों और मनुष्यों के लाभ के लिए होनी चाहिए। 
  • परमाणु हथियारों और सामूहिक विनाश के अन्य हथियारों की  अनुमति पृथ्वी की कक्षा में, आकाशीय पिंडों पर या वाह्य अंतरिक्ष के किसी अन्य स्थान पर नहीं है। 
  • प्रत्येक राष्ट्र (राज्य), अपने अंतरिक्ष वस्तुओं से होने वाले किसी भी नुकसान के लिए जिम्मेदार हैं । हर  राष्ट्र अपने नागरिकों द्वारा संचालित सभी सरकारी और गैर सरकारी गतिविधियों के लिए भी जिम्मेदार हैं। इन राज्यों को अंतरिक्ष गतिविधियों के कारण पैदा होने वाले  “हानिकारक संदूषण से बचना” चाहिए।

संधियाँ  और सिद्धांत 

वाह्य अंतरिक्ष संधि के उद्देश्य को और मज़बूत या स्पष्ट बनाने के लिए 1960 और 1970 के दशक में चार अन्य संधियाँ,  जो शांतिपूर्ण अंतरिक्ष अन्वेषण के उद्देश्य के लिए, रखा गया था। ये संधियाँ हैं:

  • “बचाव समझौता” (The Rescue Agreement -1968) 1968, अंतरिक्ष यात्रियों को , गैरइरादतन लैंडिंग के दौरान या जब वे किसी आपात स्थिति का सामना कर रहे हैं, सहायता देने के लिए किया गया था । राज्यों से कहा गया  है कि वे “उन्हें बचाने और उन्हें सभी आवश्यक सहायता प्रदान करने के लिए तुरंत, हर संभव कदम उठाए जायेंगे।”
  • “लायबिलिटी कन्वेंशन” (1972), इस विचार को रेखांकित करता है कि यदि कोई अंतरिक्ष वस्तु मानव जीवन को नुकसान या हानि पहुँचाती है तब क्या करना चाहिए । इस कन्वेंशन का पहला अनुच्छेद  कहता है, “वह राज्य जिसने अंतरिक्ष वस्तु को लॉन्च किया है वही पृथ्वी की सतह पर या विमान पर हुए नुकसान के बदले मुआवज़े का भुगतान करने के लिए उत्तरदायी होगा।”
  • “पंजीकरण कन्वेंशन” (1975), राष्ट्रों को बाहरी अंतरिक्ष में लॉन्च की गई सभी वस्तुओं पर नज़र रखने में मदद के लिए तैयार किया गया है । यह, संयुक्त राष्ट्र की रजिस्ट्री, अंतरिक्ष में  मलबे से बचने जैसे मामलों के लिए महत्वपूर्ण है।
  • चंद्रमा समझौता” (1979),वाह्य अंतरिक्ष संधि को और अधिक स्पष्टता देता  है क्योंकि इसमें संपत्ति के अधिकारों और सौर प्रणाली में उपस्थित चंद्रमा और अन्य खगोलीय पिंडों के उपयोग के लिए और अधिक विवरण देता है |  (उन वस्तुओं को छोड़कर जो प्राकृतिक रूप से अंतरिक्ष से पृथ्वी के वायुमंडल में प्रवेश करते हैं, जैसे उल्कापिंड) )। 

COPUOUS ने इन संधियों का मजबूत करने के लिए पाँच सिद्धांत भी बनाए हैं।ये है :

  • कानूनी सिद्धांतों की घोषणा 1963 (The “Declaration of Legal Principles” -1963), जिससे 1967 की वाह्य अंतरिक्ष संधि बनाई गई थी, एक मार्ग-दर्शक सिद्धांत का पालन करती है, जिसमें यह विचार शामिल है कि अंतरिक्ष अन्वेषण, सभी मनुष्यों के लाभ के लिए है।
  • ब्रॉडकास्टिंग सिद्धांतों (1982) , टेलीविजन प्रसारण सिग्नल के बारे में बताता  है। इन सिद्धांतों में, अन्य देशों के सिग्नल के साथ अहस्तक्षेप का विचार, ज्ञान विनिमय से मदद करने के लिए सूचना  का प्रावधान और शैक्षिक और सामाजिक विकास का बढ़ावा शामिल है।
  • रिमोट सेंसिंग प्रिंसिपल्स (1986) से तात्पर्य  विद्युत चुम्बकीय तरंगों के उपयोग से पृथ्वी के प्राकृतिक संसाधनों का डेटा एकत्र करना । सुदूर संवेदन गतिविधियाँ सभी देशों के लाभ के लिए होनी चाहिए और अंतर्राष्ट्रीय सहयोग की भावना से की जानी चाहिए।
  • न्यूक्लियर पावर सोर्सेज प्रिंसिपल्स (1992) इस बात पर जागरूक करता है कि अगर प्रक्षेपण के दौरान आग लग जाए या पृथ्वी से उड़ने वाला कोई अंतरिक्ष यान दुर्घटनाग्रस्त हो जाए, तो मानव और अन्य प्रजातियों को विकिरण से कैसे बचाया जाए क्योंकि बाहरी सौर प्रणाली में खोज करने वाले अंतरिक्ष यान  ऊर्जा के लिए परमाणु ऊर्जा स्रोतों का उपयोग करते हैं |  
  • लाभ घोषणा (The Benefits Declaration -1996) 1996 में कहा गया है कि अंतरिक्ष अन्वेषण सभी राज्यों के लाभ के लिए किया जाएगा। 

आज के समय में अंतरिक्ष को लेकर मुख्यतः दो प्रमुख बहसें निम्न हैं :

  1. अंतरिक्ष में हथियार की होड़ जैसे अमेरिका ने स्पेस फ़ोर्स के गठन का ऐलान किया है | 
  2. अंतरिक्ष का कचरा, धरती और अंतरिक्ष में मौजूद अन्य उपग्रह के लिए चुनौती बनता जा रहा है| 

अब कुछ नए अंतरिक्ष कानून की आवश्यकता है जो 21वी सदी की चुनौतियोँ को बेहतर तरीके से हल कर सके |

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