मुठभेड़ पर भारत का क़ानून क्या कहता है? – What does India’s law say on an encounter?

मुठभेड़ पर भारत का क़ानून क्या कहता है? : सारांश

  • विकास दुबे को मध्य प्रदेश पुलिस द्वारा गिरफ़्तार किए जाने के बाद पुलिस व एसटीएफ़ टीम दिनांक 10.07.2020 को कानपुर नगर ला रही थी |
  • कानपुर नगर भौंती के पास पुलिस का उक्त वाहन दुर्घटनाग्रस्त होकर पलट गया |
  • इसी दौरान अभियुक्त विकास दुबे ने घायल पुलिसकर्मी की पिस्टल छीन कर भागने की कोशिश की |
  • पुलिस टीम द्वारा पीछा कर उसे घेर कर आत्मसमर्पण करने हेतु कहा गया किंतु वह नहीं माना और पुलिस टीम पर जान से मारने की नीयत से फ़ायर करने लगा |
  • पुलिस द्वारा आत्मरक्षार्थ जवाबी फ़ायरिंग की गई, विकास दुबे घायल हो गया, जिसे तत्काल अस्पताल ले जाया गया, जहाँ इलाज के दौरान अभियुक्त विकास दुबे की मृत्यु हो गई |
मुठभेड़ पर भारत का क़ानून क्या कहता है?
मुठभेड़ पर क़ानून क्या कहता है?

सुप्रीम कोर्ट और राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग

  • सुप्रीम कोर्ट और राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने इस मामले पर अपने नियम-क़ानून बनाए हुए हैं |
    • अनुच्छेद 141 भारत के सुप्रीम कोर्ट को कोई नियम या क़ानून बनाने की ताकत देता है|
  • भारतीय संविधान के अंतर्गत ‘एनकाउंटर’ शब्द का कहीं ज़िक्र नहीं है |
  • पुलिसिया भाषा में इसका इस्तेमाल तब किया जाता है जब सुरक्षाबल/पुलिस और चरमपंथी/अपराधियों के बीच हुई भिड़ंत में चरमपंथियों या अपराधियों की मौत हो जाती है|
  • आपराधिक संहिता यानी सीआरपीसी की धारा 46 कहती है कि अगर कोई अपराधी ख़ुद को गिरफ़्तार होने से बचाने की कोशिश करता है या पुलिस की गिरफ़्त से भागने की कोशिश करता है या पुलिस पर हमला करता है तो इन हालात में पुलिस उस अपराधी पर जवाबी हमला कर सकती है |

राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के निर्देश

  • मार्च 1997 में तत्कालीन एनएचआरसी के अध्यक्ष जस्टिस एमएन वेंकटचलैया ने सभी मुख्यमंत्रियों को एक पत्र लिखा था।
    • उसमें पुलिस द्वारा फर्जी एनकाउंटर्स की शिकायतों का उल्लेख करते हुए उन्होंने लिखा था
      • ‘हमारे कानून में पुलिस को यह अधिकार नहीं है कि वह किसी व्यक्ति को मार दे,और जब तक यह साबित नहीं हो जाता कि उन्होंने कानून के अंतर्गत किसी को मारा है तब तक वह हत्या मानी जाएगी।’
  • जस्टिस वेंकटचलैया साल 1993-94 में सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश थे।
  • उन्होंने दो हालात बताए जिसमें जवाबी कार्रवाई में आरोपी या अपराधी की मौत को अपराध नहीं माना जा सकता।
    • पहला, अगर आत्मरक्षा की कोशिश में दूसरे व्यक्ति की मौत हो जाए।
    • दूसरा, सीआरपीसी की धारा 46 पुलिस को बल प्रयोग करने का अधिकार देती है।
      • इस दौरान किसी ऐसे अपराधी को गिरफ्तार करने की कोशिश, जिसने वो अपराध किया हो जिसके लिए उसे मौत की सजा या आजीवन कारावास की सजा मिल सकती है, वह पुलिस पर हमला कर भागने की कोशिश करे और इस कोशिश में पुलिस की जवाबी कार्रवाई में अपराधी या आरोपी की मौत हो जाए।

मुठभेड़ पर भारत का क़ानून क्या कहता है? :एनएचआरसी

  • जब किसी पुलिस स्टेशन के इंचार्ज को किसी पुलिस एनकाउंटर की जानकारी प्राप्त हो तो वह इसके तुरंत रजिस्टर में दर्ज करे।
  • किसी तरह के एनकाउंटर की सूचना मिले और फिर उस पर किसी तरह की शंका जाहिर की जाए तो उसकी जांच करना जरूरी है।
  • जांच दूसरे पुलिस स्टेशन की टीम या राज्य की सीआईडी के जरिए होनी चाहिए।
  • अगर जांच में पुलिस अधिकारी दोषी पाए जाते हैं तो मारे गए लोगों के परिजनों को उचित मुआवजा मिलना चाहिए।
  • जब कभी पुलिस पर किसी तरह के गैर-इरादतन हत्या के आरोप लगे, तो उसके खिलाफ आईपीसी के तहत मामला दर्ज होना चाहिए।
  • घटना में मारे गए लोगों के बारे में तीन महीनें के भीतर मजिस्ट्रेट जांच होनी चाहिए।
  • राज्य में पुलिस की कार्रवाई के दौरान हुई मौत के सभी मामलों की रिपोर्ट 48 घंटें के भीतर एनएचआरसी को सौंपनी चाहिए।
    • इसके तीन महीने बाद पुलिस को आयोग के पास एक रिपोर्ट भेजनी जरूरी है, जिसमें घटना की पूरी जानकारी, पोस्टमार्टम रिपोर्ट, जांच रिपोर्ट और मजिस्ट्रेट जांच की रिपोर्ट शामिल होनी चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देश

  • एनकाउंटर के दौरान हुई हत्याओं को एकस्ट्रा-ज्यूडिशियल किलिंग भी कहा जाता है।
  • 23 सितंबर 2014 को भारत के तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश आरएम लोढा और जस्टिस रोहिंटन फली नरीमन की बेंच ने एक फैसले के दौरान एनकाउंटर का जिक्र किया।
  • इस बेंच ने अपने फैसले में लिखा था कि
    • पुलिस एनकाउंटर के दौरान हुई मौत की निष्पक्ष, प्रभावी और स्वतंत्र जांच के लिए कुछ नियमों का पालन किया जाना चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट के उस फैसले की प्रमुख बातें:

  • जब भी पुलिस को किसी तरह की आपराधिक गतिविधि की सूचना मिलती है, तो वह या तो लिखित में हो (विशेषकर केस डायरी की शक्ल में) या फिर किसी इलेक्ट्रॉनिक माध्यम के जरिए हो या फिर पुलिस की तरफ से किसी तरह की गोलीबारी की जानकारी मिलती है और उसमें किसी की मृत्यु की सूचना आए, तो इस पर तुरंत प्रभाव से धारा 157 के तहत कोर्ट में एफआईआर दर्ज करनी चाहिए।
    • इसमें किसी भी तरह की देरी नहीं होनी चाहिए।
  • पूरे घटनाक्रम की एक स्वतंत्र जांच सीआईडी से या दूसरे पुलिस स्टेशन के टीम से करवानी जरूरी है,
    • जिसकी निगरानी एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी करेंगे।
    • यह वरिष्ठ पुलिस अधिकारी उस एनकाउंटर में शामिल सबसे उच्च अधिकारी से एक रैंक ऊपर होना चाहिए।
  • धारा 176 के अंतर्गत पुलिस फायरिंग में हुई हर एक मौत की मैजेस्ट्रियल जांच होनी चाहिए।
    • इसकी एक रिपोर्ट न्यायिक मजिस्ट्रेट के पास भेजनी भी जरूरी है।
  • जब तक स्वतंत्र जांच में किसी तरह का शक पैदा नहीं होता, तब तक एनएचआरसी को जांच में शामिल करना जरूरी नहीं है।
  • हालांकि घटनाक्रम की पूरी जानकारी बिना देरी किए एनएचआरसी या राज्य के मानवाधिकार आयोग के पास भेजना आवश्यक है।

वरिष्ठ वकील वृंदा ग्रोवर

  • इनके मुताबिक़ मुठभेड़ के मुद्दे पर देश में क़ानून है
    • परन्तु पूरे सिस्टम को नेताओं और पुलिस की सांठ-गांठ ने उसे  तोड़-मरोड़ कर रख दिया है |
    • नेताओं के पास कोई राजनीतिक इच्छाशक्ति नहीं है|
    • वृंदा इसे एक्स्ट्रा जुडिशल किलिंग करार देती हैं |  
  • सुप्रीम कोर्ट की एक जजमेंट है,जो आंध्र प्रदेश हाई कोर्ट के फुल बेंच के जजमेंट को सही करार देती है| 
    • उसमें साफ़ लिखा है कि ऐसे एनकाउंटर के मामले में एक एफ़आईआर दर्ज़ होनी चाहिए |
    • उस पर पुलिस जाँच होनी चाहिए, जिसमें ये पता लगाया जाए की असल में हुआ क्या था | 
  • ऐसे एनकाउंटर की जाँच एनकाउंटर में शामिल पुलिस नहीं कर सकती | वो अलग लोग होंगे |
  • ऐसी सूरत में मामले की वीडियग्राफी होनी ज़रूरी होती है |
  • एफ़आईआर में पुलिस वालों को अभियुक्त बनाया जाना चाहिए और आईपीसी की धारा 302 लगाना चाहिए| 
  • जाँच में ये बात साबित करने की ज़रूरत होती है कि आत्मरक्षा में गोली चलाई गई |  

एफ़आईआर

  • आम तौर पर ऐसा होता नहीं है| 
    • इस मामले में जो एफ़आईआर दर्ज होगी उसमें अभियुक्त होगा विकास दुबे और आईपीसी की धारा 302 के बजाय 307 लगाया जाएगा |
  • सीधे शब्दों में समझें, तो आईपीसी की धारा 302 किसी के मरने के बाद अभियुक्त पर लगाई जाती है
    • लेकिन आईपीसी की धारा 307, जान से मारने की कोशिश जैसे घिनौना अपराध में लगाया जाता है | 
  • एनकाउंटर सही नहीं है, ये साबित करने का सारा ज़िम्मा, मारे गए व्यक्ति के परिवार पर पड़ता है | 

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सोशल मीडिया से लेकर तमाम मीडिया चैनल पर मुठभेड़ को लेकर कर सवाल पूछे जा रहे हैं |

“अपराधी का अंत हो गया, अपराध और उसको संरक्षण देने वाले लोगों का क्या?”

प्रियंका गांधी

“दरअसल ये कार नहीं पलटी है, राज़ खुलने से सरकार पलटने से बचाई गई है |”

पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव

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