IAS PRELIMS 2019 QUESTION 10: व्याख्या

IAS PRELIMS 2019 QUESTION 10: व्याख्या

IAS PRELIMS 2019 QUESTION 10 : गुप्त काल के दौरान भारत में बलात् श्रम (विष्टि) के संदर्भ में, निम्नलिखित में से कौन-सा कथन सही है?

a)इसे राज्य के लिए आय का एक स्रोत, जनता द्वारा दिया जाने वाला एक प्रकार का कर, माना जाता था।

b)यह गुप्त साम्राज्य के मध्य प्रदेश तथा काठियावाड़ क्षेत्रों में पूर्णतः अविद्यमान था।

c)बलात् श्रमिक साप्ताहिक मजदूरी का हकदार होता था।

d)मजदूर के ज्येष्ठ पुत्र को बलात् श्रमिक के रूप में भेज दिया जाता था।

IAS PRELIMS 2019 QUESTION 10: व्याख्या

गुप्तकालीन

‘प्रयाग प्रशस्ति’ में शक्तिशाली गुप्त सम्राट समुद्र गुप्त को पृथ्वी पर शासन करने वाला ईश्वर का प्रतिनिधि कहा गया है। साम्राज्य की प्रशासन व्यवस्था और राजस्व आदि की नीति बहुत सुदृढ़ थी। गुप्त काल में राजकीय आय के प्रमुख स्रोत ‘कर’ थे |

  • गुप्तकालीन लेखों में स्थूल रूप से 18 प्रकार के करों का निर्देश किया गया है पर इनका विवरण नहीं दिया गया।
    • पृथक् रूप से केवल तीन करों(भागकर, भोगकर, भूतोवात-प्रत्याय) का ही उल्लेख किया गया है।
    • इस काल की स्मृतियों के अध्ययन से ज्ञात होता है कि परम्परागत रूप से जो विविध कर मौर्य-युग से चले आ रहे थे वे गुप्तकाल में भी वसूल किये जाते थे |
      • यद्यपि उनके नाम और दर आदि में कुछ-न-कुछ अन्तर इस समय में अवश्य आ गया था।

कर राजस्व

  • भाग
  • भोग
  • उद्रग
  • उपरिकर
  • धान्य
  • भूतोवात-प्रत्याय
  • बैष्ठिका- बलात् श्रमिक (मध्य और पश्चिम भारत ग्राम वासियों से सरकारी सेना और अधिकारियों की सेवा के लिए बेगार (निशुल्क श्रम) भी कराया जाता था जो विष्टि कहलाता था | भूमि का स्वामी कृषकों एवं उनकी स्त्रियों से बेगार या विष्टि लिया करता था | इसे राज्य के लिए आय का एक स्रोत, जनता द्वारा दिया जाने वाला एक प्रकार का कर, माना जाता था।)
  • भत या भट्ट (पुलिस कर)
  • प्रणय- ग्रामवासियों पर लगाया गया एक अनिवार्य कर
  • चारासन- चारागाहों पर शुल्क
  • चाट- लुटेरे द्वारा उत्पीड़न से मुक्ति का कर
  • दशापराध- दस प्रकार के अपराधों के लिए किए गए जुर्माने
  • हलदण्ड- यह हल पर लगाया जाता था। 
  • भाग – यह कर राजा को भूमि के उत्पादन से प्राप्त होने वाले भाग का चौथा से छठा हिस्सा होता था।
  • भोग – संभवतः राजा को हर दिन फल-फूल एवं सब्जियों के रूप में दिया जाने वाला कर।
  • प्रणयकर – गुप्त काल में यह ग्रामवासियों पर लगाया गया अनिवार्य या स्वेच्छा चंदा था। भूमिकर भोग का उल्लेख ‘मनुस्मृति’ में भी हुआ है। इसी प्रकार ‘भेंट’ नामक कर का उल्लेख ‘हर्षचरित’ में आया है।
  • उपरिकर एवं उद्रंगकर – यह एक प्रकार का भूमि कर होता था। भूमि कर की अदायगी दोनों ही रूपों में ‘हिरण्य’ (नकद) या ‘मेय’ (अन्न) में किया जा सकता था, किंतु छठी सदी के बाद किसानों को भूमि कर की अदायगी अन्न के रूप में करने के लिए बाध्य होना पड़ा। गुप्त अभिलेखों में भूमिकर को ‘उद्रंग’ या ‘भागकर’ कहा गया है। 
  • हलदण्ड कर – यह कर हल पर लगता था। गुप्त काल में वणिकों, शिल्पियों, शक्कर एवं नील बनाने वाले पर राजकर लगता था।
  • भूतोवात-प्रत्याय- बाहर से अपने देश में आने वाले और अपने देश से उत्पन्न होने वाले विविध पदार्थों पर जो कर लगता था, उसे भूतोवात-प्रत्याय कहते थे।
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